महेश गोस्वामी की रिपोर्ट
डाकघर कर्नलगंज में ड्यूटी पर मौजूद कर्मियों द्वारा शराब व मीट पार्टी के वायरल हुए वीडियो की सरासर अनदेखी कर जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा आरोपित कर्मियों को संरक्षण देकर मामले को ठण्ढे बस्ते में डालकर अभी तक संबंधित कर्मियों के विरुद्ध कोई विभागीय वैधानिक कार्यवाही ना करने का है मामला।) .... कर्नलगंज/गोंडा ।। योगी सरकार में जिले के तेजतर्रार कहे जाने वाले जिलाधिकारी मार्कण्डेय शाही के जीरो टॉलरेंस कार्यवाही और दावे की जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी सरासर अनदेखी कर हवा निकाल रहे हैं। जिसकी जमीनी हकीकत बीते महीने डाकघर कर्नलगंज में कर्मचारियों द्वारा खुलेआम शराब और मीट पार्टी करते हुए सरकारी फरमान की धज्जियां उड़ाकर सरकारी कार्यालय को शराब मीट पार्टी अड्डा बनाकर ड्यूटी के समय जहां एक तरफ लोगों की मौजूदगी में अन्य कर्मियों द्वारा कार्य किया जा रहा था वहीं दूसरी और दो डाक कर्मचारियों द्वारा दबंगई मनमानीपूर्ण बेखौफ होकर डाकखाने के अंदर शराब के जाम के साथ मीट खाते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने एवं जिले के प्रशासनिक विभाग के अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद विभाग की काफी फजीहत होने से प्रधान डाकघर के डाक अधीक्षक द्वारा जानबूझकर विभागीय कर्मियों के उक्त घोर शर्मनाक अपराधिक कृत्य को नजरअंदाज कर उन्हें प्रत्यक्ष संरक्षण देते हुए वीडियो वायरल होने के मामले को स्थानीय स्तर पर दबाकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है जिसमें करीब 1 महीने होने को हैं इसके बावजूद घटना में संलिप्त निरंकुश डाक कर्मियों के विरुद्ध कोई वैधानिक दण्डनीय सख्त कार्यवाही न करके विभागीय गरिमा को धूमिल करते हुए भ्रष्टाचार व मनमानी कृत्यों को बढ़ावा दिया जाना प्रतीत हो रहा है।यही नहीं संपूर्ण सरकारी व्यवस्था पर दाग लगा कर कलंकित करने वाले डाक कर्मी विभाग में निरंकुश होकर अभी भी कार्यरत हैं व इनके हौंसले बुलंद हैं,जो अधिकारियों की निरंकुश कार्यप्रणाली व भ्रष्ट आचरण व्यवस्था की पोल खोल रही है साथ ही समूचे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा करती दिखाई दे रही है।शायद जिलाधिकारी के सारे निर्देश और सख्त तेवर अधिकारियों कर्मचारियों के सामने कोई मायने नहीं रखते व बौने साबित हो रहे हैं। *अब देखना यह है कि डीएम श्री शाही का तेजतर्रार रवैया जीरो टॉलरेंस कार्यवाही का असर इन पर होता है या नहीं अथवा " *जब सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का" वाली कहावत चरितार्थ होती है अथवा "चिराग तले अंधेरा" और "दूर के ढोल सुहावने होते हैं" वाली लाइनें सटीक बैठती हैं।। इस भ्रष्ट सरकारी तंत्र व्यवस्था को देखकर एक शायर का शेर सही साबित होता है कि *बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है हर डाल पर उल्लू बैठे हैं अंजाम गुलिस्ता क्या होगा*???
