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बैंक कर्मियों की हठधर्मिता, कमीशनखोरी के चलते ऋण से वंचित युवक ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सहित आला अधिकारियों से लगाई गुहार।



महेश गोस्वामी/संदीप शुक्ला की रिपोर्ट
रोजगार हेतु ऋण प्राप्त करने को आवेदक बैंक और अधिकारियों के चक्कर काटने को विवश,बैंक आनाकानी कर नहीं दे रहा सरकार की स्वरोजगार योजनाओं के लिए ऋण)   
#गोंडा जनपद के तहसील क्षेत्र कर्नलगंज अन्तर्गत स्टेट बैंक शाखा कर्नलगंज से संबंधित है                                       
कर्नलगंज/गोंडा। जहां एक मोदी और योगी सरकार युवाओं को उनकी आजीविका हेतु स्वरोजगार करने की विभिन्न योजनाएं चलाकर लोगों को ऋण उपलब्ध कराते हुए रोजगार मुहैया कराने के दावे कर रही है,वहीं सरकार के जिम्मेदार आलाअधिकारी व राष्ट्रीयकृत बैंकों के अधिकारियों की उदासीनता के चलते बैंक कर्मी सरकार की मंशा को तार-तार कर ठेंगा दिखाने से बाज नहीं आ रहे हैं।बैंक भी सिर्फ उन्हीं का ऋण स्वीकृत करने पर जोर दे रहे हैं जिसके पास पहले से ही पूंजी है और वह चढ़ावे के तौर पर निश्चित मुंहमांगा कमीशन देने में सक्षम होते हैं।कई बेरोजगार ऐसे हैं जो ऋण के लिए बीते एक वर्ष से बैंकों के चक्कर काट रहे हैं।ऐसे में प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि पीएम के मेक इन इंडिया का सपना कैसे पूरा होगा क्योंकि व्यवसाय शुरू करने के लिए उन्हें ऋण नहीं मिल रहा है।सरकार की मंशा भले ही बेरोजगार युवक-युवतियों को ऋण उपलब्ध कराने की हो ताकि वे स्वरोजगार कर सकें,लेकिन सरकार के अधीनस्थ बैंक व जिम्मेदार विभाग पूरी तरह इस मामले में उदासीनता बरतते हैं।जिसका जीता जागता उदाहरण तहसील क्षेत्र के ब्लॉक कर्नलगंज के अन्तर्गत रोजगार हेतु भारतीय स्टेट बैंक द्वारा आवेदक को ऋण ना उपलब्ध कराने का है।प्राप्त जानकारी के अनुसार आवेदक पंकज कुमार द्वारा प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सहित आलाअधिकारियों को को भेजे गये पत्र में कहा गया है कि आवेदक ने विगत वर्ष 2019-20 में प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत ऋण प्राप्त करने हेतु आनलाइन आवेदन किया था जिसके क्रम में विभाग द्वारा इंटरव्यू के बाद स्वीकृत ऋण पत्रावली स्टेट बैंक शाखा कर्नलगंज गोंडा को ऋण प्रदत्त करने हेतु भेज दी गयी जहां फाइल बैंक आने के पश्चात तत्कालीन फील्ड आफीसर कमलेश जी ने दुकान का सर्वे कर कार्यवाही पूर्ण कर ऋण संक्शेन कर दिया और कहा कुछ दिन बाद आपको सेंक्शन लेटर मिल जायेगा।इसी बीच उनका तबादला कहीं अौर हो गया,कुछ दिनों बाद बैंक में सम्पर्क करने पर मौजूद बैंक के फील्ड आफिसर विनय कुमार यादव जी ने बताया कि आपकी फाइल संक्सेन हो गयी है मगर ऋण मिलने में 30000 (तीस हजार रुपये)खर्च लगेंगे, मगर आवेदक के पास खर्च के रूपये नही थे इसलिए फील्ड आफीसर विनय यादव जी ने बगैर जानकारी दिये हमारी फाइल वापस विभाग को भेज दी और उसके बाद बताया कि तुम्हारे पिता जी का दूसरे बैंक मे लोन है इसलिये तुम्हारी फाइल वापस भेज दी गयी।जिससे आवेदक ने मजबूर होकर उक्त ऋण पत्रावली पुन: वापस बैंक को मंगवाने व शीघ्र ऋण दिलाने की मांग अब तक कई बार विभिन्न माध्यमों से करते हुए जनसुनवाई पोर्टल,  मुख्यमंत्री हेल्पलाइन, जिलाधिकारी,बैंक के अधिकारियों,उद्योग विभाग के अधिकारियों सहित अनेकों  अधिकारियों से की जा चुकी है इसके बावजूद जिम्मेदार लोगों द्वारा ऋण उपलब्ध कराने में आनाकानी करते हुए टालमटोल किया जा रहा है वह एक दूसरे के ऊपर मामला छोड़कर समस्या का निराकरण ना करके गुमराह पूर्ण रिपोर्ट लगाकर समस्या निस्तारण दर्शाकर खानापूर्ति कर ली जाती है जिससे आवेदक ऋण से वंचित होकर बैंक और जिम्मेदार विभागीय अधिकारियों के काफी चक्कर काटने के बावजूद समस्या अनसुनी होने से काफी त्रस्त होकर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री  सहित उच्चाधिकारियों को पत्र भेजकर ऋण पत्रावली को वापस बैंक भेजे जाने और शीघ्र ऋण दिलाने एवं समस्या के त्वरित निस्तारण की मांग करते हुए गुहार लगाई है।जिससे आवेदक अपना रोजगार प्रारम्भ कर सके।*#स्वरोजगार के लिए ऋण लेना चाहा तो बैंक ने मुंह मांगा सुविधाशुल्क ना मिलने से मनमानी तौर से इंकार करके अभी तक ऋण नहीं दिया गया।....पंकज कुमार (आवेदक)*#आलम ये है कि अब तो बैंकों की मॉनीटरिंग करने वाले लीड बैंक अधिकारियोंं ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।जिला उद्योग केंद्र (डीआईसी) में 8वीं पास बेरोजगारों को लोन देने के लिए बनी योजनाओं का लाभ मिलना मुश्किल होता जा रहा है। डीआईसी की कई सब्सिडी वाली योजनाओं में लाभार्थियों को लोन देने में बैंक आनाकानी कर रही हैं।कई जगह बेरोजगारों को शर्तों के फेर में उलझाकर लोन से वंचित रखा जा रहा है।इस मामले में कई लोग बैंक अधिकारियों के रवैये को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ बैंकर्स इसके लिए संबंधित विभाग को दोषी ठहरा रहे हैं।दोनों की खींचतान में बेरोजगार बिना लोन बैठे हैं।उद्योग विभाग द्वारा मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत 20 हजार से 10 लाख तक की सहायता बैंकों के माध्यम से ऋण के रूप में स्वीकृत किए जाने का प्रावधान है।एक वर्ष से अधिक बीत गये हैं,बेरोजगार आज भी बैंकों के चक्कर काट रहे हैं।#राष्ट्रीयकृत बैंक अधिकारियों की ओर से ऋण देने में बरती जा रही उदासीनता को लेकर अब सरकार के पास शिकायतें जा रही हैं।# जिसके चलते सीएम हेल्प लाइन में शहर के बैंकों द्वारा बेरोजगारों को ऋण नहीं देने की करीब एक दर्जन से अधिक शिकायतें दर्ज हैं। बेरोजगारों का कहना है, कि यदि हमारे पास पूंजी होती तो फिर बैंकों से ऋण लेने की आवश्यकता क्यों होती।बेरोजगारों का कहना है कि हर साल आवेदन भरने में 500 से 1000 रुपए तक खर्च हो जाते हैं फिर भी उन्हें लोन नहीं मिल पा रहा है।*कमीशन का चलता है खेल*सूत्रों की अगर माने तो बैंक में ऋण दिलाने के लिए दलालों का सहारा लिया जाता है। केसीसी और अन्य तरह के लोन बैंक द्वारा दिए जाते हैं पर मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना, प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत ऋण के लिए भेजे गए आवेदक को ऋण देने में बैंक आनाकानी करते हैं, क्योंकि इसमें अधिकांश ऐसे लोग बेरोजगार रहते हैं जिनके पास कमीशन देने के लिए पैसे नहीं होते।बैंक प्रबंधक ने ऋण देने के लिए यह कहकर मना कर दिया कि हम आपका ऋण स्वीकृत नहीं कर सकते।मना करने को लेकर अन्य तर्क भी दिये गये।                                                              *जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक ने कहा कि* उनके स्तर से आवेदकों का साक्षात्कार करवा कर स्वीकृत आवेदन को बैंक भेज दिया जाता है।अब बैंक का दायित्व है कि वह बेराजगार युवक-युवतियों को ऋण उपलब्ध कराए ताकि वे स्वरोजगार कर सकें,लेकिन बैंक पूरी तरह इस मामले में उदासीनता बरतते हैं। जिसके कारण अनुदान की भी राशि लौट जाती है।जानकार मानते हैं कि सब्सिडी वाली तमाम योजनाओं में बैंक मैनेजर बेरोजगारों के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखे तो काफी हद तक स्थितियां बदल सकती है।
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